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Submitted by Sukant Kumar on
मैं आत्मनिर्भर बन गया!

सरकारी हॉस्पिटल के धक्के खाने की हिम्मत नहीं है, इसलिए प्राइवेट डॉक्टर के १० मिनट के दर्शन के लिए ४०० रुपये देता आया हूँ। 

कल बेटी की तबियत ख़राब हुई। डॉक्टर के पास ले गया, विधिवत तरीक़े से अपने नंबर का इंतज़ार किया। जाते हुए डॉक्टर ने हिदायत दी की कल आ कर बेटी की हालत के बारे में बतायें। सो मैं दोपहर में गया, तो डॉक्टर ने बोला बेटी को साथ में क्यों नहीं लाए। 

मैंने पूछा - आपने तो बस मरीज़ की हालत रिपोर्ट करने बोला था। सो मैं आ गया। वो अभी ठीक है। 

डॉक्टर ने बोला शाम को छह बजे बेटी को ले कर आना। और हाँ छह बजे से देर मत करना। मुझे बाहर निकालना है।

मैं छह बजने के १० मिनट पहले पहुँच गया। वहाँ बैठे कंपाउंडर ने बताया साहेब सात बजे के पहले नहीं आने वाले। आप टाइम से क्यों नहीं आये?

मैं चुप-चाप घर आ गया। प्राइवेट डॉक्टर के पॉलिसी के अनुसार एक बार फ़ीस भरने के बाद एक हफ़्ते तक दुबारा फ़ीस नहीं ली जाएगी।  इसलिए मरीज़ को एक हफ़्ते तक टहलाते रहने की पुख़्ता साज़िश रचा रखी है। 

प्राइवेट हॉस्पिटल की हालत सरकारी दफ़्तर जैसी होने लगी है, क्योंकि सरकारी दफ़्तरों पर तो सरकार ने ताला लगाने की ठान ही ली है। अब बने रहो आत्मनिर्भर।

इसलिए पड़ोस से प्राइवेट कंपाउंडर को बुलाया और बेटी की हाथ में लगी पानी चढ़ाने वाली सुई निकलवा दी। मैं भी “आत्मनिर्भर” बन गया। पब्लिक सेक्टर से उदास हो कर प्राइवेट के पास गया। वहाँ से भी जब दुदकारा गया, तो मैं आत्मनिर्भर बन गया।

बधाइयाँ रुकनी नहीं चाहिए।

बजाओ ताली!

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