Skip to main content

आत्म-अवधारणा

Submitted by admin on
Elizabeth B॰ Hurlock ने “Self-Concept या आत्म-अवधारणा” को बड़ी बारीकी से समझाने का प्रयास किया है। जिसके लिये उन्होंने कई दार्शनिकों और मनोवैज्ञानिकों के द्वारा दी गई परिभाषाओं और सिद्धांतों का प्रयोग किया है। उन्होंने William James और Sigmund Freud जैसे मनीषी दार्शनिकों के साथ-साथ कुछ नामचीन मनोवैज्ञानिकों का भी ज़िक्र किया है। जिसका सटीक अनुवाद करना, मुझे अपनी इस तत्कालीन परियोजना के लिए ज़रूरी नहीं प्रतीत होता है। अगर ज़रूरत पड़ी तो उसका अनुवाद करने का भी प्रयास करूँगा। फ़िलहाल, मैं आत्म-अवधारणा की अपनी समझ को प्रस्तुत करने की अनुमति चाहूँगा। क्योंकि, मेरा अनुमान है कि छात्रों में इन्हीं आत्म-अवधारणाओं के निर्माण की ज़िम्मेदारी समाज की है। ख़ासकर, शिक्षा-व्यवस्था की जवाबदेही है।

इहलोक की अवधारणा

Submitted by admin on
इस लोक की अनंतता में ही उसकी समग्रता है। शून्य ख़ुद में पूरा है — ख़ुद मूल्यवान भी है, मूल्यहीन भी वही है। शून्य “०” अनंत भी है — उसके अंदर भी एक पूरी दुनिया है, उसके बाहर भी एक पूर्ण ब्रह्मांड बसता है। कल्पना के परे भी कोई दुनिया है, या हो सकती है, इससे शायद ही कोई तार्किक प्राणी एतराज रखेगा। एक बेहतर और बदतर दुनिया की कल्पना शुरुवात से हमारे साथ चलती आ रही है। आज भी साथ है, आगे भी अपना साथ निभाते ही जाएगी।

Push A Little

Submitted by Sukant Kumar on

Usually things fall to grounds,

The fallen becomes nothing but dust,

To preserve them, you need to

Push a little.

 

Usually the appearances fades away,

Beauty die with ages,

To maintain the charm, makeup every moment,

थोड़ा ज़ोर लगाना पड़ता है

Submitted by Sukant Kumar on

अमूमन चीज़ें गिर जाती हैं,

गिर धरत्ती पर मिट जाती हैं,

उपर थामे रखने को,

हर पल ज़ोर लगाना पड़ता है

 

अमूमन सूरत ढल जाती है,

ढल उमर संग मर जाती है,

सुंदरता कायम रखने को,

हर पल सृंगर रचाना पड़ता है

I am Time

Submitted by Sukant Kumar on

I think, when life will be on waning ends,

When death will try to lure me,

What those words would be,

That summarises this life-story.

 

What will be the story?

Immaculate childhood or a thoughtless youth,

Or a dejected, sad, pathetic life,

सूरज, गुलाब और हवा

Submitted by Sukant Kumar on

यूँ डुबकर किसी दिन,

ना हम सूरज कहलाएँगे,

हम फिर उगकर आयेंगे,

और तब सूरज कहलाएँगे।

 

यूँ मुरझाकर इक रोज़,

ना हम गुलाब कहलाएँगे,

हम जब जब ख़ुशबू फैलाएँगे,

हम तब तब गुलाब कहलाएँगे।

 

यूँ बहते हुए हर पल भी,

ना हम हवा कहलाएँगे,

हम जब जीवन दे पायेंगे,

हम तब हवा कहलाएँगे।

 

एक दिन उगेगा सूरज भी,

उस दिन गुलाब भी खिलेगा,

वक़्त हूँ मैं

Submitted by Sukant Kumar on

सोचता हूँ जिंदगी की जब शाम आएगी,

मौत जब द्वार खड़े पास बुलाएग,

तो वे कौन शब्द होंगे जुबां पर,

जो इस कहानी के सारांश होंगे।

 

क्या होगी कहानी ?

बेबाक बचपन, अल्हड़ जवानी,

या सहमा जीवन, निशब्द ज़िंदगानी,

सॉफ्टवेयर इंजीनियर का इस्तीफा

Submitted by Sukant Kumar on
एक ऑफिस का फ्लोर, फ्लोर पर कंप्यूटर, कई लोग उसके सामने बैठे हैं, कोशिश है चल जाए, आपने-आपने गृहस्ती का कैलकुलेटर।

Sun, Rose and Wind

Submitted by Sukant Kumar on

Setting on horizons,

We won’t be sun,

When we rise back again,

Then, shall we be called Sun.

 

Withered like this one day,

Nor shall we be called roses,

Whenever we will spread fragrance,

Then, shall we be called roses.

My trip to salvation

Submitted by Sukant Kumar on
I don't know what the future holds for me. But I am sure I am coming back again for more. This sojourn has given me something I have been missing for long. I shall be off to bed now as it's already midnight and I have to drive for nine and half hours according to Google.

Podcasts