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एक लोकतांत्रिक अवतार

Submitted by admin on
मेरे अनुमान से इस शिक्षा व्यवस्था में एक ऐतिहासिक और दार्शनिक दोष है। हमारे इतिहास में आज तक पुनर्जागरण काल नहीं आया, जब जनमानस को अपनी रचना-शक्ति पर आस्था हो। यह आस्था ही थी जिसने साहित्य, कला के रास्ते उद्योग की रचना की। हमारे आदिकाल में ही कहीं स्वर्ण-युग की तलाश में देश और काल की जवानी बर्बाद हुए जा रही है। सृजन की संभावना कुछ युवाओं को दिखती भी हैं। पर, वे छोटी-मोटी उपलब्धि से ही संतुष्ट हो जाते हैं। वे सत्याग्रह नहीं करते। वे अपने सच को ही सत्य मान बैठते हैं। मुझे उनकी दरिदता पर तरस भी आता है। मैं चाहकर भी कुछ कर नहीं पाता हूँ। हिन्दी विभाग के सृजनशील शिक्षकों की बातों से भी मुझे निराशा के अलावा कुछ हाथ नहीं लगा। अनुभव में भी वे दरिद्रता ही तलाशते मिले। मैं भी किसी का अपमान नहीं करना चाहता, शौक़ से गालियाँ देता हूँ, पर किसी की भावना को चोट पहुँचाने की प्रवृति मेरी तो नहीं।

लोक-माया-तंत्र-जाल

Submitted by Sukant Kumar on
देश में ना मौजूदा प्रशासन और ना ही वर्तमान राजनीति को लोक या जनता की ज़रूरत है। प्राइवेट सेक्टर को तो आपकी या मेरी, या हमारे बच्चों की कभी चिंता थी ही नहीं! इसलिए तो तंत्र तानाशाह बन गया है। इनकम टैक्स से लेकर टोल टैक्स तक सीधे जनता के खाते से तंत्र के खाते में पहुँच रहा है। इधर, इहलोक में शायद ही कोई बचा है, जो अपने बच्चे से भी प्यार करता है। फिर भी आपको लगता है कि लोकतंत्र बचा हुआ है, और उसे बचाने के लिए कुछ भी किया जा सकता है। तो मेरी तरफ़ से आप सबको हार्दिक शुभकामनाएँ!

एक दार्शनिक समस्या और समाधान

Submitted by Sukant Kumar on
मुक्ति के लिए लोक को हर काल और स्थान पर अपने ज्ञान पर आस्था बनानी पड़ती है। नास्तिकता एक बौद्धिक पंथ है, जो आस्था का ही अनादर करती है। इस कारण पंथ की समस्या बरकरार ही रहती है और रंग में भंग डालने के लिए नास्तिकों का एक अलग पंथ चला आता है। महफ़िल खूब सजती है, सबको मज़ा भी खूब आता है। कब रंगों की होली, खून की होली में बदल जाती है? इतने शोर-शराबे में किसी को पता भी नहीं चलता। जब पता चलता है, तब लोक अपनी भावनात्मक और तार्किक व्यथा व्यक्त करता है। सामाजिक समस्या में मौजूद जो दर्शन है, उसे देखने की कोई कोशिश ही नहीं करता है। इहलोक और इस तंत्र में हम अपने-अपने पद, प्रतिष्ठा और पैसे का मज़े तो ले लेते हैं, पर कभी आनंद किसी को नहीं मिलता। इसलिए, कोई ज्ञान को नहीं पूछता, इहलोक अपनी ही मस्ती की अज्ञानता में मूर्तियों और प्रतीकों के पीछे भागा जा रहा है।

हमारी धार्मिक समस्यायें

Submitted by Sukant Kumar on
धार्मिक समस्या पाखंड में निहित है। दर्शन, मिथक और कर्मकांड तक तो धर्म ही था, चाहे वह किसी भी पंथ का क्यों ना हो! पाखंड से ही तो धर्मालयों और राजनीति की दुकान चल रही है, जो लोक के लिए एक जानलेवा नशा है। तंबाकू या दारू से कहीं ख़तरनाक समाज की शिक्षा के प्रति उदासीनता का जो कैंसर है, वह पूरे लोक और तंत्र को तबाह किए हुए है। यही सामाजिक अज्ञानता, मेरी धार्मिक समस्या है, जिससे मेरा व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक जीवन अस्त-व्यस्त है। जिसके निवारण के लिए मैंने दर्शन की शरण ली थी। अब मेरी दार्शिनिक समस्या भी पढ़ लीजिए।

बेटी! तुम ज़रूर पढ़ना!

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तुम्हारा पिता, तुमसे से वादा करता है — तुम्हें वो इस काबिल बनाएगा कि एक देश की लोकतंत्र की गद्दी को चुनौती दे सको। तुममें इतनी ऊर्जा और ईमानदारी होगी की तुम इस लोक में इस तंत्र को सम्भाल सको। फिर तुम अपने जैसा इस देश की हर बेटी और उनके भाइयों को बनाना, ताकि वे तुमसे तुम्हारी गलती का हिसाब संवैधानिक तरीक़े से ले सके।

बेहतर होगा

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जिस समाज में

एक,

विद्यार्थी, विद्या से,

नौकर, अपनी नौकरी से,

मरीज़, डॉक्टर से,

शरीफ, पुलिस से,

बेक़सूर, अदालत से,

वोटर, नेता से,

ईमानदार, पूरे सिस्टम से,

डरता है।

 

जहां हर कोई भगवान से डरता हो,

इक फ़लसफ़ा

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सबको “भगवान” की तलाश थी,

सब अपने-अपने सफ़र पर निकले।

 

कुछ को मिले,

वे ज्ञान बाँट रहे हैं।

 

कुछ को आभास हुआ,

वे शांति से अपना काम कर रहे हैं।

 

बाक़ी को भ्रम-मात्र है,

वे बस कर्मकांड निभा रहे हैं।

सवाल ही तो है….

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कितना सरल है ये जताना कि - “मेरे बच्चे! मैं तुमसे प्यार करता हूँ”?

फिर भी ना जाने क्यों हम अपने ही बच्चे को ही सताये चले जा रहे हैं? 

 

कितना आसान है ये समझना कि हमें “सच” का साथ देना चाहिए? 

फिर क्यों हम झुठ का साथ निभाये चले जा रहे हैं?

 

कितना मुश्किल है ये देखना की “बेईमानी और चोरी” से कभी किसी का भला नहीं हुआ?

जीवन गणित

Submitted by Sukant Kumar on

सुना है अक्सर लोगों को कहते,

कभी तो वक़्त बुरा है,

कभी क़िस्मत बुरी है,

कभी दुनिया बुरी है,

तो कभी नसीब खोटा है।

 

क्यों वे लोग नहीं कहते -

बुरा ही सही, ये वक़्त मेरा है,

फूटी ही सही, क़िस्मत ये मेरी है,

छोटी ही सही, ये दुनिया भी मेरी है,

सेक्स एजुकेशन

Submitted by Sukant Kumar on
“अरे भाई! मुझे लगता है इस विषय पर अच्छा शोध हो सकता है। पीएचडी में दाख़िला लेने वाला हूँ। कोई अच्छा रिसर्च टॉपिक तो होना ना चाहिए। इससे अच्छा क्या हो सकता है कि मैं सेक्स एजुकेशन जो काफ़ी उपेक्षित विषय है, उसके दार्शनिक, सामाजिक और मानसिक पहलू पर शोध करूँ। जिस तरह से सेक्स-संबंधी समस्याएँ समाज में है, मुझे ज़रूरी लगता है की इस पर पहल की जाये। मेरा तो ये भी अनुमान है की कई राजनीतिक और सामाजिक समस्याएँ इसी कमी के कारण मौजूद हैं आज के समाज में। इसलिए लोगों की राय ले रहा था। पर सब लोग तो बिलकुल चुप हैं।”

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