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एक आर्थिक समाधान: पब्लिक पालिका

Submitted by Sukant Kumar on
आज सुबह पहली मुलाक़ात रवीश कुमार से हुई। अरसा हो गया जब कोई तार्किक व्यवहारिक प्राणी मुझे व्यक्तिगत जीवन में मिला हो। खैर, रवीश जी रघुवीर सहाय के डायरी के पन्नों को पढ़कर हाल की में हुए दिल्ली चुनाव की व्याख्या करने की कोशिश कर रहे थे। सुनकर बहुत बुरा लगा कि १९६२ में हुए दिल्ली चुनाव में भी हम, भारत के लोगों को राजनीति वैसे ही हाँक रही थी, जैसे आज चरा रही है। थोड़ा आगे बढ़ा तो राहुल गांधीजी से मुलाकात हुई। वे ड्रोन लिए युद्ध की रणनीति समझते मिले। मुझे लगा आज जब ज्ञान विज्ञान इतना आगे बढ़ चुका है, तब भी लोक और तंत्र दोनों युद्ध के लिए इतना आतुर क्यों हैं?

पब्लिक पालिका का बजट

Submitted by Sukant Kumar on
सूचना क्रांति आज एक नए मुकाम पर खड़ी है। ज्ञान अर्थव्यवस्था में सूचना ही नई मुद्रा है। कृत्रिम बुद्धि के उपयोग से हम हर विद्यार्थी के लिए एक अनूठा रास्ता तराश सकते हैं। अब स्कूलों में परीक्षाएं नहीं होंगी। ये सारी सामग्री हर विद्यार्थी को जनहित में उपलब्ध रहेगी। स्थानीय स्कूल को इंटरनेट से जोड़कर देश भर की पब्लिक पालिकाएँ यह सुविधा हर छात्र तक पहुंचाएगी। यहाँ हर कल, विज्ञान की विधा पर विशेषज्ञों के व्याख्यान अखीकृत तौर पर उपलब्ध होंगे। छात्र और शिक्षक मिलकर बेहतर सामग्री करने हेतु शोध और सृजन का रास्ता अपनायेंगे। इस उम्मीद के साथ इस बजट में कुछ और जरूरी संशोधन किए गए हैं। अब देश के नागरिक अपनी मांगों को पब्लिक पालिका को दे सकती है, और जहाँ आयकर एक ख़ास सीमा से ऊपर होगा, वहाँ से राज्य पालिका तक अर्थ के रास्ते खुलेंगे। अब नागरिक नहीं, स्थानीय सरकार ही कमाकर राज्य सरकार को पाल रही होगी। राज्य सरकार की जिम्मेदारी उन क्षेत्रों में संसाधनों की आपूर्ति करने की रहेगी जहाँ आय कम हैं। इस तरह अर्थ की आपूर्ति वहाँ भी होगी जहाँ अब तक बिजली नहीं पहुंची। इसी तरह मुद्रण का प्रवाह राज्य से अब केंद्र की ओर होगा, जहाँ से केंद्र उन राज्यों पर विशेष ध्यान देगा जहाँ अभाव का बोध होगा।

केंद्र ख़तरे में है ॰॰॰

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हर समस्या की जड़ आस्था के केंद्र में निहित है। आस्था तो हर समस्या का समाधान है। तभी तो हर समस्या की जड़ आस्था का केंद्र बन जाता है।

पिछले साल के लोकसभा के चुनाव से लेकर आज तक की ख़बरों पर मैंने अपना शोध किया है। कुछ तथ्यों के आधार पर मैं अपने कथन को स्थापित करने की कोशिश करूँगा। कालक्रम में एक एक कदम पीछे चलते राजनीति की ऐतिहासिक गली में चलिए टहलकर आते हैं। कदम अगर लड़खड़ाये तो सहारे की उम्मीद रखता हूँ। आज ८ फ़रवरी, २०२५ को दिल्ली में भाजपा की सरकार बनी। आज सुबह ही मुझे एक ख्याल आया था कि अगर आज बीजेपी की सरकार दिल्ली में बनी तो केंद्र ख़तरे में आ जाएगा। ऐसा मुझे क्यों लगा इसके पीछे

टूटते घर, बनते मकान!

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पता है! गांव से गुजरते लगता है जैसे पाषाण युग में हम जी रहे हैं। बच्चे पत्थरों से खेल रहे थे। एक दिन नहीं, पिछले एक हफ़्ते से मैं उन्हें पत्थरों से खेलते देख रहा हूँ। हमने तो उनकी हथेलियों से गुल्लियाँ तक छीन लीं। गुल्लियों की गूँज भी इन गलियों में अब कहाँ सुनाई देती है। बस एक चीखता अहंकार लाउडस्पीकर पर सुनाई पड़ता है। घर टूट रहे हैं। मकान बने जा रहे हैं। जैसे किसे ने मुमताज के लिए ताजमहल बनाने की ज़िद्द ठानी हो। बेचारे यहाँ के बच्चे शहरों में धूल फाँककर शेखी बघार रहे हैं। मेरे ससुराल का आँगन जुगनू की बिदाई के बाद सुना हो जाएगा। क्यूंकि यहाँ लौटकर आने वाला अब कोई परिंदा मुझे नजर नहीं आता। मकान भी जर्जर हुआ जा रहा है। किसे चिंता है? सोचो! घर नहीं बनाओगे तो कहाँ लौटकर आओगे?

गाँव बचाओ अभियान

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भारत के गाँव मर रहे हैं, और इसके साथ ही मर रहा है हमारा लोकतंत्र। यह कोई काव्यात्मक अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि एक ठोस वास्तविकता है, जिसे आँकड़ों से सिद्ध किया जा सकता है। 1951 की जनगणना में 82.7% भारतीय गाँवों में रहते थे, आज यह संख्या घटकर 65% के आसपास आ गई है। शहरीकरण को अगर "विकास" का पर्याय मान भी लें, तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह असंतुलित विकास है, एक तरफ़ा प्रवास है, और मूल रूप से एक सामाजिक एवं आर्थिक पतन का लक्षण है।

Public Palika: समस्या से समाधान तक

Submitted by Sukant Kumar on
अगर शासन की वर्तमान व्यवस्था को सुधारने के प्रयास नहीं किए गए, तो यह धार्मिक ठगी, आर्थिक भ्रष्टाचार और शिक्षा के पतन का चक्र ऐसे ही चलता रहेगा। लेकिन अगर पब्लिक पालिका जैसी नीतियाँ अपनाई जाती हैं, तो हम एक ऐसा समाज बना सकते हैं जहाँ करदाताओं को यह अधिकार हो कि उनके पैसे का उपयोग कैसे किया जाए।

Four Hypotheses: Public Palika

Submitted by Sukant Kumar on

Good morning. I tried recording the script with satisfactory results. However, I need to improvise before final release. I need to hone up my oration to make the desired impact. The motive behind this creation is to distribute the idea of Public Palika for open discussion particularly within the academics. According to me it is an economic solution to the present crisis India and Indians are facing. I want to make one more episode before I take the Idea to public.

एक लोकतांत्रिक अवतार

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मेरे अनुमान से इस शिक्षा व्यवस्था में एक ऐतिहासिक और दार्शनिक दोष है। हमारे इतिहास में आज तक पुनर्जागरण काल नहीं आया, जब जनमानस को अपनी रचना-शक्ति पर आस्था हो। यह आस्था ही थी जिसने साहित्य, कला के रास्ते उद्योग की रचना की। हमारे आदिकाल में ही कहीं स्वर्ण-युग की तलाश में देश और काल की जवानी बर्बाद हुए जा रही है। सृजन की संभावना कुछ युवाओं को दिखती भी हैं। पर, वे छोटी-मोटी उपलब्धि से ही संतुष्ट हो जाते हैं। वे सत्याग्रह नहीं करते। वे अपने सच को ही सत्य मान बैठते हैं। मुझे उनकी दरिदता पर तरस भी आता है। मैं चाहकर भी कुछ कर नहीं पाता हूँ। हिन्दी विभाग के सृजनशील शिक्षकों की बातों से भी मुझे निराशा के अलावा कुछ हाथ नहीं लगा। अनुभव में भी वे दरिद्रता ही तलाशते मिले। मैं भी किसी का अपमान नहीं करना चाहता, शौक़ से गालियाँ देता हूँ, पर किसी की भावना को चोट पहुँचाने की प्रवृति मेरी तो नहीं।

उद्योग “बनाम” सहोद्योग

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जब तक जंगल के क़ानूनों पर लोकतंत्र चलता रहेगा, मुझे तो उम्मीद नहीं है कि कुछ भी जीवन के पक्ष में बदल पाएगा। जब शिक्षा-दीक्षा में प्रतियोगिता से सहयोग की भावना का संचार होगा, तभी जिस लड़ाई को हम और आप लोकतंत्र के दंगल में लड़े जा रहे हैं, उसका समाधान मिल पाएगा। धर्म और शिक्षा जिस सामाजिक अवधारणा की स्थापना हमारे अंतःकरण में करती रहेगी, उसी आधार पर हमारी दुनिया चलती रहेगी।

महंगाई: आर्थिक या काल्पनिक

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महंगाई — किसी भी अर्थव्यवस्था का एक अनिवार्य अवांछनीय भाग है। अकसर, महंगाई की साहित्यिक तुलना डायन से की जाती रही है। क्यों महंगाई बढ़ जाती है? मेरी समझ से इसके तीन आयाम हैं, जिसमें तीन घटक अपनी भूमिका निभाते हैं। ये तीन घटक कुछ इस प्रकार हैं — माँग, आपूर्ति और क्रय शक्ति। आय और क्रय शक्ति का सीधा संबंध है। जितनी आय होगी, हमारी क्रय शक्ति उतनी ही होगी, वैसे कर्जा लेकर हम अपनी क्रय शक्ति बढ़ा सकते हैं।

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