पॉवलोव महाराज का कुत्ता
श्रीमान पॉवलोव ने अपने कुत्ते पर प्रयोग किया था। कुत्ते को ख़ाना देने से पहले उन्होंने घंटी बजाना शुरू किया। कुछ ही समय में कुत्ते को यह बात समझ में आ गई कि जब भी घंटी बजती है, उसे ख़ाना मिलता है। एक दिन मुहूर्त निकालकर पॉवलोव भाई ने घंटी तो बजाई, पर कुत्ते को ख़ाना नहीं दिया। बेचारा, कुत्ता लार टपकता ही रह गया। इस प्रयोग को कई मनोवियज्ञानिकों ने दुहराया और इसी निष्कर्ष पर पहुँचे। इसलिए, इसे सिद्धांत का दर्जा दे दिया गया। पॉवलोव महाराज के कारण ना जाने कितने कुत्तों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ हुआ होगा?