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क्यों हम अपने ही बच्चों से नफ़रत करते हैं?

Submitted by GyanarthShastri on

यह एक कठोर प्रश्न है, लेकिन ज़रूरी है।
हम अपने बच्चों से प्रेम करते हैं, यह बात तो हम बार-बार दोहराते हैं।
लेकिन जब हम उनकी मासूमियत को अनुशासन में दबाते हैं,
उनकी जिज्ञासा को अंकतालिकाओं में तोलते हैं,

The Identification Problem

Submitted by Sukant Kumar on
No identification is as important as self-identification. But to answer the question - “Who am I?”, is not that straightforward. Self is a true treasure, and this journey to self is a real adventure but definitely, it's not the easy one. Most aspirants give up, some catch a glimpse and rare among us attain the status close to that of Buddha.

एक दार्शनिक समस्या और समाधान

Submitted by Sukant Kumar on
मुक्ति के लिए लोक को हर काल और स्थान पर अपने ज्ञान पर आस्था बनानी पड़ती है। नास्तिकता एक बौद्धिक पंथ है, जो आस्था का ही अनादर करती है। इस कारण पंथ की समस्या बरकरार ही रहती है और रंग में भंग डालने के लिए नास्तिकों का एक अलग पंथ चला आता है। महफ़िल खूब सजती है, सबको मज़ा भी खूब आता है। कब रंगों की होली, खून की होली में बदल जाती है? इतने शोर-शराबे में किसी को पता भी नहीं चलता। जब पता चलता है, तब लोक अपनी भावनात्मक और तार्किक व्यथा व्यक्त करता है। सामाजिक समस्या में मौजूद जो दर्शन है, उसे देखने की कोई कोशिश ही नहीं करता है। इहलोक और इस तंत्र में हम अपने-अपने पद, प्रतिष्ठा और पैसे का मज़े तो ले लेते हैं, पर कभी आनंद किसी को नहीं मिलता। इसलिए, कोई ज्ञान को नहीं पूछता, इहलोक अपनी ही मस्ती की अज्ञानता में मूर्तियों और प्रतीकों के पीछे भागा जा रहा है।

हमारी धार्मिक समस्यायें

Submitted by Sukant Kumar on
धार्मिक समस्या पाखंड में निहित है। दर्शन, मिथक और कर्मकांड तक तो धर्म ही था, चाहे वह किसी भी पंथ का क्यों ना हो! पाखंड से ही तो धर्मालयों और राजनीति की दुकान चल रही है, जो लोक के लिए एक जानलेवा नशा है। तंबाकू या दारू से कहीं ख़तरनाक समाज की शिक्षा के प्रति उदासीनता का जो कैंसर है, वह पूरे लोक और तंत्र को तबाह किए हुए है। यही सामाजिक अज्ञानता, मेरी धार्मिक समस्या है, जिससे मेरा व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक जीवन अस्त-व्यस्त है। जिसके निवारण के लिए मैंने दर्शन की शरण ली थी। अब मेरी दार्शिनिक समस्या भी पढ़ लीजिए।

कुछ राजनैतिक समस्यायें

Submitted by Sukant Kumar on
कौन सी ऐसी सामाजिक समस्या है, जिसका निदान तंत्र नहीं कर सकता है? पर इस लोक की समस्या ही तो यही है कि तंत्र ख़ुद ही एक समस्या बन चुका है और लोक उस समस्या की अग्नि में उधार लेकर घी डाल रहा ह। जो आग एक-न-एक दिन उसका घर ही जला डालेगी। लोक तो बस जलने का इंतज़ार करता प्रतीत होता है। हालत तो ऐसी है कि देश में ना मौजूदा प्रशासन और ना ही वर्तमान राजनीति को लोक या जनता की ज़रूरत है। इनकम टैक्स से लेकर टोल टैक्स तक सीधे जनता के खाते से तंत्र के खाते में पहुँच रहा है। आज कोई असहयोग आंदोलन की कल्पना तक नहीं कर सकता है। जो चालक हैं, वो इतिहास से सत्ता सुख भोगने का नुस्ख़ा निकाल ही लेते हैं। मेरी समझ से तो मौजूदा समाज में लोकतंत्र भी आभासी या वर्चुअल जो चुका है। जैसे, सोशल मीडिया पर हम अभिव्यक्ति की आज़ादी तलाश रहे हैं! कहीं कुछ होता है, हम शोक मनाने लगते हैं, या जश्न! अर्थशास्त्र के नाम पर लोक बस चंदा दे रहा है, तंत्र बटोर रहा है, और हम तमाशा देख रहे हैं। प्राइवेट सेक्टर को तो आपकी या मेरी, या हमारे बच्चों की कभी चिंता थी ही नहीं। इसलिए तो तंत्र तानाशाह बन गया है।

कुछ सामाजिक समस्यायें

Submitted by Sukant Kumar on
फलों के मुख्यतः तीन प्रकार हैं - जाति, आयु और भोग। ये फल हमें हमारे कर्मों के अनुरूप मिलते हैं। जाति द्वारा हमारे जन्मों का निर्धारण होता है। आयु से यहाँ सिर्फ़ हमारी उम्र का ही निर्धारण नहीं होता है, बल्कि हमारे फलों की आयु का भी निर्धारण होता है, अर्थात् जो फल हम भोग रहे हैं, वो हम कितनी देर तक भोगेंगे, दुख ज़्यादा होगा या सुख, इसका निर्धारण भी आयु से होता है। भोग का सीधा संबंध हमारी क्रियाएं, अनुभूतियाँ और परिणाम से है, सुख-दुःख, लाभ-हानि, भोग-रोग आदि।

मेरी पारिवारिक समस्यायें

Submitted by Sukant Kumar on
विज्ञान भी मानता है कि हमारा शरीर उन्हें पाँच तत्वों को मानता है, जिसे भारतीय दर्शन में पंचमहाभूत माना गया है - आकाश (Space) , वायु (Quark), अग्नि (Energy), जल (Force) तथा पृथ्वी (Matter)। रट्टा मारकर इन बच्चों का क्या भला हो जाएगा? किसी तरह यह बच्चे प्रधानमंत्री या न्यायाधीश भी बन गये तो जीवन के ख़िलाफ़ ही अपना फ़ैसला सुनायेंगे। जीवन को समझकर ही तो मेरे बच्चे समाज में अपना योगदान दे पायेंगे। वरना मेरी ही तरह वे भी नालायक ही रह जाएँगे। वे किसान बनेंगे या कलेक्टर यह तो वे ही तय करेंगे। मेरा मक़सद तो उन्हें अधिकतम आजीविका और पहचान को नकारने का अवसर देना है, जैसा चाहे-अनचाहे मुझे मेरे माता-पिता ने दिया है, या समाज से मैंने छीनकर लिया है। शिक्षा-व्यवस्था को भी कुछ ऐसे ही मौक़े के चुनाव को ज्ञान-पूर्ण तरीक़े से हर छात्र को देना चाहिए। पर इसमें खर्च लगेगा, सुना है लोक राजा है, और राजा के पास किस बात की कमी है? अच्छी शिक्षा मिलेगी, तभी तो ये बच्चे ईमानदारी से ख़ुद को पहचानकर सृजनात्मक और रचनात्मक ढंग से समाज में अपना योगदान दे पायेंगे। यह मेरी पारिवारिक समस्या भी है, जहां से मेरी सामाजिक समस्या भी शुरू होती है।

मेरी आर्थिक समस्यायें

Submitted by Sukant Kumar on
जीवन का अर्थ तो आनंद की मात्रा और उसकी गुणवत्ता ही तय करती है। आनंद तो ज्ञान के रास्ते ही मिल सकता है। यह रास्ता किसी के लिए निर्धारित नहीं है, यहीं हम अपने इच्छा-स्वातंत्र्य का प्रयोग करते हैं। यही चुनाव हमारे जीवन के अर्थों का मापदंड है। राम और रावण दोनों ही ज्ञानी थे, उनमें अंतर तो आनंद का ही था। रावण में जो महत्त्वाभिलाषा थी, भोग-विलास की जो लोलुपता थी, उसकी जो शारीरिक हवस थी, जिसके लिए उन्होंने सीता का अपहरण किया था, वह उस ज्ञानी को अभिमानी बना देती है। रावण हमारे अहंकार और घमंड का प्रतीक है। राम अपनी मर्यादा के लिए जाने जाते हैं। उनमें ईमानदारी है, आत्मसम्मान है, स्वाभिमान है। राम और रावण दोनों ही हमारे अंदर हैं, हमें तो बस हर पल चुनाव करना है। यही चुनाव हमारे अस्तित्व को हर क्षण अर्थ देता है। एक पल में जो राम थे, वही अगले क्षण रावण का किरदार निभा सकते हैं।

मेरी मनोवैज्ञानिक समस्यायें

Submitted by Sukant Kumar on
मेरी दो प्रमुख मनोवैज्ञानिक समस्या है। पहला नशा है। मैं कई तरह के नशे का सेवन करता आया हूँ। तंबाकू से शुरू करते हुए मैं शराब तक पहुँच, जहां से ड्रग्स के रास्ता भी कुछ दूर चल चुका हूँ। संभोग एक शारीरिक समस्या तो बाद में है, वह पहले तो यह एक मानसिक उलझन है। नशे से उत्तपन्न भ्रम और संशय ने मेरी चेतना को अज्ञानता के कुचक्र में रहने को मजबूर कर दिया है। हर प्रकार की शारीरिक कमजोरी से लेकर कैंसर तक का सफ़र मैंने अपनी कल्पनाओं में कई बार तय किया है।

मेरी व्यक्तिगत समस्यायें

Submitted by Sukant Kumar on
वनस्पति या पशु जीवन को हमारी ज़रूरत नहीं है, पर हमें हर प्रकार के जीवन की ज़रूरत जान पड़ती है। आख़िर ख़ाना जो आवश्यक त्रय का हिस्सा है, जिसकी पूर्ति तो अन्य जीवन के स्रोतों से ही हमें प्राप्त होती हैं, चाहे हम शाकाहारी हों, या मांसाहारी। अंतर तो सिर्फ़ भावनात्मक स्तर पर होता है, जो Mid-Brain पर आधारित है। आवश्यक त्रय से जुड़ी हर संभावनाओं के लिए हमारा Old-Brain सक्रिय होता है, जिसके अन्तर्गत ख़ाना, संभोग और ख़तरा आता है। इन्हीं तीन पयमानों पर मैं अपनी व्यक्तिगत समस्याओं को समझने की कोशिश करूँगा।

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