Skip to main content

कौशल भारत योजना

Submitted by Sukant Kumar on
मैं सुन कर सकते में आ गया। २ घंटे में जो विद्यार्थी राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा देने जाने वाला है, वो मुझ ग़रीब से पूछ रहा है - क्या सवाल आयेगा और वो क्या जवाब देगी? मुझे ग़ुस्सा आ गया। मैंने बोला - “बहन! आप जाना, आँख बंद करना कोई एक ऑप्शन पर उँगली रखना और औका-बौक़ा तीन तड़ौक़ा कर लेना। कृपया आप नहा-धुआ के तैयार हो जायें। अगरबत्ती वग़ैरह जलायें, समय बचे तो थोड़ा होम-हवन या झाड़-फूंक करवा लें। मन को शांति मिलेगी। मुझ पर रहम करें। आपका वक़्त बहुत क़ीमती है।”

शार्टअप इंडिया

Submitted by Sukant Kumar on
“अचचचचचच्छा। बहुत ही बढ़िया पिलान है आपका आऊ सरकारवा का हमका बुड़बक बनावे के ख़ातिर। पहिले १०,००० प्लस टैक्स ले कर आप काटोगे, फिर सरकार उसके बाद अलग से काटेगी, बड़का बाबू अलग दे माँगेगा अपना हिस्सा…” पता नहीं बीच में कब उसने कॉल काट दिया। हमारी तो बात ही अधूरी रह गई। पिछले २ दिनों से बज रहे राम-धुन की आवाज वापस ध्यान खींचने लगी - “हरे राम। हरे कृष्णा। कृष्णा-कृष्णा हरे-हरे….”

मनचले

Submitted by Sukant Kumar on
कान और कंधे के बीच फ़ोन चिपकाए, सुरेशवा अपना मोटरसाइकिल ४० के स्पीड पर बिना हेलमेट चला जा रहा था। अचानक एक टेम्पो वाला साइड काटा, काहे की एक ठो पैसेंजर चिलाया - “रोको बे! अब का अपने घर ले के जावेगा!” पीछे से सुरेशवा ठुकते-ठुकते बचा। फ़ोन नीचे गिर गया था। स्मार्ट फ़ोन था, सुरेशवा का कलेजा धक से रह गया। बाइक छोड़ फ़ोन पर लपका। उसके पीछे से दु ठो हवलदार जो अभी तक बतियाते हुए आ रहे थे। दौड़ कर घटना स्थल पर पहुँचे। सुरेशवा फ़ोन उठा कर देख रहा था कहीं स्क्रीन फुट तो नहीं गया? पुलिस देख कर सोचा बाइक उठाने आ रहे होंगे। मदद करेंगे। दुनों आये, बाइकवा उठाया। सुरेशवा के मन में विचार आया कि धन्यवाद ज्ञापन कर दे। सो, गया और बोला - “धन्यवाद!”

मेरा शोध-प्रस्ताव 

Submitted by Sukant Kumar on
अपने लेखन-परियोजना के दूसरे खंड - "आगे क्या?" पर मैंने काम करना शुरू किया। पर क़रीब 9 अध्याय लिखने के बाद, मुझे अपने लेखन से संतुष्टि नहीं मिली। इसमें सुधार करने की हिम्मत नहीं है। सुधार करने से आसान, मुझे नयी शुरुवात करना ज़्यादा उचित लगा। नौवाँ अध्याय पूरा नहीं हो पाया, अधूरा ही है, शायद ही पूरा हो। पर इसी क़िस्से को एक नये अन्दाज़ में फिर से लिखूँगा।

मैं प्रधानमंत्री बनना चाहता हूँ!

Submitted by Sukant Kumar on
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होते हुए भी हम कितने असहाय हैं, अपने जीवन में सही अभिव्यक्ति को तलाशने में। हम जब कहना चाहते हैं - क्यों नहीं हो पाएगा.. हमारी अभिव्यक्ति में कहीं छिपा होता है - ये नहीं हो पाएगा। हम ख़ुद को जब अभिव्यक्त कर पाने में सक्षम नहीं तो कैसे हम लोकतंत्र को समझ पायेंगे? कैसे वोट कर चुन पायेंगे अपनों को जो हम लोगों के लिये काम कर पाये? Democracy में demoशोध लोगों के लिए था, भारत पहुँचते पहुँचते वो लोकतंत्र हो गया। लोक की सीमा नहीं है, पूरा संसार ही नहीं, उसके परे की भी सलतनत इस परिभाषा में शामिल है - इहलोक भी और परलोक भी। तभी तो मंदिर और मस्जिद के नाम पर वोट करते हैं हम, परलोक के भरोसे। Democracy के लिए हिन्दी में सही शब्द “लोगतंत्र” होना चाहिए था, मेरी समझ से। वैसे लोक ज़्यादा उचित है क्योंकि उसमें इंसान ही नहीं पशु पक्षी भी शामिल किए जा सकते हैं, परियावरण भी। पर ये तभी हो पाएगा जब लोगतंत्र स्थापित हो जाये तब अगला पड़ाव लोकतंत्र का हो सकता है। जब बात विस्तार की आये, तब। जब ज्ञान अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच जाये, तब। और ये तब हो पाएगा जब हम जीवन का अर्थ यानी मतलब और अर्थ यानी मूल्य को समझ पायेंगे।

वंशवाद

Submitted by Sukant Kumar on
फिर देखेंगे हम सब, एक नयी पीढ़ी, इस दुनिया को कैसे, खूबसूरत बनाती है॥

गलती

Submitted by Sukant Kumar on
यह घटना बहुत पुरानी है। मुश्किल से मैं तीसरी या चौथी कक्षा में पहुँचा था, उम्र ८-१० साल की रही होगी। स्कूल में छुट्टी गर्मी की छुट्टियाँ चल रही थी। घर पर माँ नहीं थी। पिताजी मुझे पढ़ा रहे थे। अचानक उन्हें कुछ काम याद आया। उन्होंने कहा - “तुम पढ़ो, मैं थोड़ी देर में आता हूँ।”

मैं आत्मनिर्भर बन गया!

Submitted by Sukant Kumar on
प्राइवेट हॉस्पिटल की हालत सरकारी दफ़्तर जैसी होने लगी है, क्योंकि सरकारी दफ़्तरों पर तो सरकार ने ताला लगाने की ठान ही ली है। अब बने रहो आत्मनिर्भर। इसलिए पड़ोस से प्राइवेट कंपाउंडर को बुलाया और बेटी की हाथ में लगी पानी चढ़ाने वाली सुई निकलवा दी। मैं भी “आत्मनिर्भर” बन गया। पब्लिक सेक्टर से उदास हो कर प्राइवेट के पास गया। वहाँ से भी जब दुदकारा गया, तो मैं आत्मनिर्भर बन गया।

पिता की प्रसव पीड़ा 

Submitted by Sukant Kumar on
एक हफ़्ते तक बहू भी हॉस्पिटल में भर्ती रही। बेटा, दादा, दादी और बाक़ी परिवार के लोग सब कुछ सम्भालते रहे। बेटे ने देखा बाक़ी सारे मरीज़ों का भी ऑपरेशन ही हुआ। क्या जब ऑपरेशन का विकास नहीं हुआ था तब बच्चे नहीं होते थे। सिर्फ़ पैसे के लिए डॉक्टर मरीज़ से खेलता रहता है - वह सोचता रहा। डॉक्टर ने बिल से भी ज़्यादा पैसों की माँग की। नर्सों ने बक्शीश माँगने में भी कोई शर्म नहीं दिखायी। महँगी से महँगी दवाई मंगवायी गयी। पैसे का मोह बहुत नहीं था, बेटे में। पर सब के लालच को देख कर वह सर पीट कर सोच रहा था - “ऐसे समाज में क्यूँ उसने बच्चा पैदा कर दिया।”

Podcasts