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एक गुमशुदा काल

एक समय था, जब यह देश सोने की चिड़िया कहलाता था। हमारा सत्य सनातन था, सटीक था। ब्रह्म सत्य थे, और जगत मिथ्या। संभवतः, , इसीलिए मिथकों पर ही हमने अपनी आस्था को निछावर कर दिया। अपनी ज़रूरतों पर हमने ही अपने इतिहास में ध्यान नहीं दिया। हमने इतिहास की भी ज़रूरत को नज़रंदाज़ कर दिया। हमें अपना ही इतिहास किसी मिथक से कम कहाँ लगता है? तभी, तो लोकतंत्र ना जाने कहाँ से प्रमाण ला-लाकर हमारा इतिहास ही बदलने की फ़िराक़ में क्यों रहता है?

विश्वास के प्रमाण

शिक्षा की सबसे अहम ज़रूरत हमारी ज़रूरतों के बीच संतुलन क़ायम करने का है। एक अशिक्षित तार्किक प्राणी अपनी ज़रूरतों का नीति-निर्धारण करने में असमर्थ होता है। इसलिए, शिक्षा के माध्यम से सभ्यता स्थापित करने का प्रयास, लोकतंत्र आदिकाल से करता आया है। राजनैतिक पृष्ठभूमि पर लोकतंत्र अभी बच्चा है। अभी तो इसे भी शिक्षा की ज़रूरत है। ताकि वह अपनी ज़रूरतों को समझते हुए, नीति-निर्धारण कर सके। इसके लिए ही हर लोक के बुद्धिजीवी ज़िम्मेदार हैं। हर शिक्षक, प्रशिक्षक और छात्र की यही तो बुनियादी ज़िम्मेदारी है।

इहलौकिक जिजीविषा

स्वर्ग, मोक्ष, मुक्ति, जन्नत या हेवन एक ही अभिलाषा या कल्पना के अलग-अलग रूप हैं। दुख या दर्द हो, या इंद्रियों को प्राप्त सुख ही क्यों ना हो? भोगती तो चेतना ही है, जो ख़ुद आत्मा का क्षणिक वर्तमान है। आत्मा की शाश्वतता को हमारी चेतना वर्तमान की अनंतता के साथ जोड़कर ही समझ पाती है। सुख-दुख अनुभव के पात्र हैं। अनुभूति और अनुभव में बारीक अन्तर है। अनुभव के लिए इंद्रियों का सक्रिय होना ज़रूरी है। अनुभूति विचारों और भावनाओं से भी प्रभावित होती रहती है। अनुभूति वह एहसास है, जिसे हमारी चेतना महसूस कर पाती है। अनुभूतियों का दायरा अनुभव से बड़ा है। अनुभूति शरीर और इंद्रियों से परे है। अनुभूतियों का अस्तित्व ही काल्पनिक है। अनुभव की एकरूपता भी अनुभूति की समानता को स्थापित नहीं कर सकती है। हर अनुभव में अनुभूति का योगदान है। पर, अनुभूति को अनुभव पर आश्रित नहीं रहना पड़ता है। वह विचारों और कल्पनाओं में स्वतंत्र विचरण कर सकती है। यहाँ तक कि अनुभूतियाँ, चेतना में कई काल्पनिक अनुभवों का संप्रेषण करने में सक्षम है। कल्पनाएँ इंद्रियों को भी प्रभावित करने का हुनर जानती है।

पाठशाला या मधुशाला?

लोकतंत्र दवा में भी दारू मिलकर बेच रहा है। दवा की दुकानों से जितनी मदिरा मेरा इहलोक अपने-अपने घर लाता है, उतनी कभी किसी मैखानों में भी कहाँ बिकी होगी। पर दवा की ज़रूरत वह जानता है, क्योंकि लोकतंत्र ने ही उसे बतायी है। अपनी मधुशाला की ज़रूरत समझने के लिए ही तो आत्मनिर्भर होना हमारे लिए ज़रूरी है। अगर अपनी ज़रूरतों को हम समझ पाते, तो शायद अपने बच्चों की औक़ात को तंत्र के दिये प्रमाणपत्रों के आधार पर नहीं आंकते।

बेटी! तुम ज़रूर पढ़ना!

तुम्हारा पिता, तुमसे से वादा करता है — तुम्हें वो इस काबिल बनाएगा कि एक देश की लोकतंत्र की गद्दी को चुनौती दे सको। तुममें इतनी ऊर्जा और ईमानदारी होगी की तुम इस लोक में इस तंत्र को सम्भाल सको। फिर तुम अपने जैसा इस देश की हर बेटी और उनके भाइयों को बनाना, ताकि वे तुमसे तुम्हारी गलती का हिसाब संवैधानिक तरीक़े से ले सके।

बेरोज़गारी का आलम

देश में बेरोज़गारी इस कदर बढ़ गई है कि दो से तीन भिखारियों का रोज़ कॉल आता है। पढ़े लिखे बेरोज़गार और करेंगे भी क्या? या तो मंदिरों में घंट बजायेंगे या फिर दफ़्तर-दर-दफ़्तर अपना बायोडेटा ले कर चप्पल घिसेंगे। जब तक हिम्मत बचेगी सरकारी नौकरी के लिए तैयारी करेंगे। जब चप्पल पूरी खिया जाएगी तब ग़लत रास्ते चल देंगे। कुछ पहले ही अपनी औक़ात नाप कर लग जाएँगे दो नंबर के धंधे में।

सेक्स एजुकेशन

“अरे भाई! मुझे लगता है इस विषय पर अच्छा शोध हो सकता है। पीएचडी में दाख़िला लेने वाला हूँ। कोई अच्छा रिसर्च टॉपिक तो होना ना चाहिए। इससे अच्छा क्या हो सकता है कि मैं सेक्स एजुकेशन जो काफ़ी उपेक्षित विषय है, उसके दार्शनिक, सामाजिक और मानसिक पहलू पर शोध करूँ। जिस तरह से सेक्स-संबंधी समस्याएँ समाज में है, मुझे ज़रूरी लगता है की इस पर पहल की जाये। मेरा तो ये भी अनुमान है की कई राजनीतिक और सामाजिक समस्याएँ इसी कमी के कारण मौजूद हैं आज के समाज में। इसलिए लोगों की राय ले रहा था। पर सब लोग तो बिलकुल चुप हैं।”

सेक्स एजुकेशन की ज़रूरत

अगर ध्यान करना अपने अस्तित्व को चेतन रूप में निहारना है, तो संभोग का अपमान ठीक विपरीत प्रक्रिया है, जो उसके मूल उद्देश्य का विपरीतार्थक है। आज-तक मेरा अनुमान था की जिस सामाजिक यातना से हम हर रोज़ रूबरू होते हैं, उसकी जड़ें धार्मिक प्रवृति की हैं। इसलिए मैं धर्म से नफ़रत करता आया था। पर मेरे नये अनुभव और अद्ध्यन से मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा की अंदर से इन जड़ों में कामुकता या हवस का वास है। इंसान की कामुक अक्षमता ही हिंसा की जननी है - सोच और व्यवहार दोनों ही स्तरों पर। दार्शनिक भाषा में कहें तो वीर्य ऊर्जा के असंतुलन और असंतुलित प्रयाग से अशुभ की समस्या उत्पन्न होती है।

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