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शिक्षा, स्वराज और पब्लिक पालिका: एक नई सभ्यता की नींव

Submitted by Sukant Kumar on
आज जब हम ग्लोबल विलेज की बात करते हैं, तो यह सोचने का समय है कि राष्ट्र और सीमाओं की परिभाषा पर पुनर्विचार किया जाए। यदि लोकल प्रशासन को सशक्त किया जाए और संसाधनों का नियंत्रण जनता के हाथ में हो, तो क्या यह नस्लीय, धार्मिक और राजनीतिक संघर्षों को कम नहीं करेगा? यदि पब्लिक पालिका मॉडल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लागू किया जाए, तो युद्ध, शरणार्थी संकट और आर्थिक शोषण जैसी समस्याओं को जड़ से समाप्त किया जा सकता है। आखिर, युद्ध वे लड़ते हैं जिन्हें जनता के भविष्य से कोई सरोकार नहीं।

पब्लिक पालिका: व्यक्ति से विश्व तक

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पब्लिक पालिका की कल्पना को जीवर्थशास्त्र और इहलोकतंत्र के बिना नहीं समझा जा सकता है। व्यक्ति की जरूरतों और व्यक्तित्व की समृद्धि के लिए जीवर्थशास्त्र में नौ आयामों की चर्चा मिलेगी, जिसे तीन खंडों में समझा जा सकता है — आवश्यक त्रय, अस्तित्वगत त्रय, और शाश्वत त्रय। आवश्यक त्रय में खाना, संभोग और खतरा शामिल है। अस्तित्वगत जरूरतों में शरीर, आत्मा और चेतना की बातें हैं, और शाश्वत त्रय में ईश्वर, सत्य और जीवन को जगह दी गई है। एक लोकहित कल्याणकारी राज्य की जिम्मेदारी बनती है कि उसके निवासियों की बुनियादी जरूरतों की आपूर्ति पर सक्रिय जवाबदेही निभायी जाए।

एक आर्थिक समाधान: पब्लिक पालिका

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आज सुबह पहली मुलाक़ात रवीश कुमार से हुई। अरसा हो गया जब कोई तार्किक व्यवहारिक प्राणी मुझे व्यक्तिगत जीवन में मिला हो। खैर, रवीश जी रघुवीर सहाय के डायरी के पन्नों को पढ़कर हाल की में हुए दिल्ली चुनाव की व्याख्या करने की कोशिश कर रहे थे। सुनकर बहुत बुरा लगा कि १९६२ में हुए दिल्ली चुनाव में भी हम, भारत के लोगों को राजनीति वैसे ही हाँक रही थी, जैसे आज चरा रही है। थोड़ा आगे बढ़ा तो राहुल गांधीजी से मुलाकात हुई। वे ड्रोन लिए युद्ध की रणनीति समझते मिले। मुझे लगा आज जब ज्ञान विज्ञान इतना आगे बढ़ चुका है, तब भी लोक और तंत्र दोनों युद्ध के लिए इतना आतुर क्यों हैं?

पब्लिक पालिका का बजट

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सूचना क्रांति आज एक नए मुकाम पर खड़ी है। ज्ञान अर्थव्यवस्था में सूचना ही नई मुद्रा है। कृत्रिम बुद्धि के उपयोग से हम हर विद्यार्थी के लिए एक अनूठा रास्ता तराश सकते हैं। अब स्कूलों में परीक्षाएं नहीं होंगी। ये सारी सामग्री हर विद्यार्थी को जनहित में उपलब्ध रहेगी। स्थानीय स्कूल को इंटरनेट से जोड़कर देश भर की पब्लिक पालिकाएँ यह सुविधा हर छात्र तक पहुंचाएगी। यहाँ हर कल, विज्ञान की विधा पर विशेषज्ञों के व्याख्यान अखीकृत तौर पर उपलब्ध होंगे। छात्र और शिक्षक मिलकर बेहतर सामग्री करने हेतु शोध और सृजन का रास्ता अपनायेंगे। इस उम्मीद के साथ इस बजट में कुछ और जरूरी संशोधन किए गए हैं। अब देश के नागरिक अपनी मांगों को पब्लिक पालिका को दे सकती है, और जहाँ आयकर एक ख़ास सीमा से ऊपर होगा, वहाँ से राज्य पालिका तक अर्थ के रास्ते खुलेंगे। अब नागरिक नहीं, स्थानीय सरकार ही कमाकर राज्य सरकार को पाल रही होगी। राज्य सरकार की जिम्मेदारी उन क्षेत्रों में संसाधनों की आपूर्ति करने की रहेगी जहाँ आय कम हैं। इस तरह अर्थ की आपूर्ति वहाँ भी होगी जहाँ अब तक बिजली नहीं पहुंची। इसी तरह मुद्रण का प्रवाह राज्य से अब केंद्र की ओर होगा, जहाँ से केंद्र उन राज्यों पर विशेष ध्यान देगा जहाँ अभाव का बोध होगा।

Need I say more?

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We are living in a state of personal anarchy. A person is a state in the manner it maintains a sustainable equilibrium with the society one lives in. However, ethical virtues are invariantly applied on a person only in a social environment. Ethics is not at all a personal affair. Before, we delve into the current affairs need I point out that the Eternal Triad is the utmost concern of the Law of the Land. Because, since generations we have been rules under Divine Rule blessed under the Lordship of God. The fall of the medieval ages of Western civilisation is the stark example we must adhere to in the devastating nature of religion hold up by the righteousness of Crusades. No one can count number of dead during the partition of India, and we might be in the midst of Thrid World War. I wonder how many those who lived to see the light of Independence Day, 1947 knew they had just came out of a world war? Even today given the level of education we get I wonder...

हिंदू राष्ट्र बनाम पब्लिक पालिका

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I would like you to critically evaluate this thought - हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना क्या है? अगर यह एक ख़ास जनजाति का राज होगा, तो निःसंदेह एक ख़ास वर्ग वंचित रह जाएगा। अगर वंचित ही बहुमत होगा, तो कब तक यह जुमला लोकतंत्र में चलता रहेगा?

केंद्र नहीं, गाँव-घर बचाइए!

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मेरे अनुमान से Educational Reform या शिक्षा क्रांति के बिना पब्लिक पालिका कभी एक सामाजिक सच्चाई नहीं हो पाएगी। भारतीय मानसिकता आज भी भगवान भरोसे बैठी है। जिज्ञासा का सामाजिक और व्यक्तिगत अस्तित्व ही शैक्षणिक गलियों में नाली के कीड़े बराबर बची है। हम सब किसी पर जिम्मेदारी या आरोप लगाकर मुक्ति तलाश रहे हैं। बहुत कम ही आर्थिक क्षेत्र बचे हैं जहाँ भारत का वर्चस्व बचा है। मुश्किल से इज्जत बचाने वाली मानसिकता मध्य वर्गीय सोच में बहुमत में व्याप्त है। जीवन स्वाभाविक रूप से आलसी होता है। तभी जिज्ञासा विज्ञान की शरण में सुख तलाशती है। आज का सनातनी अपने किसी भी वर्ण या आश्रम में ख़ुद से ईमानदार नहीं है। पारिवारिक परिवेश में भ्रष्टाचार का खुलेआम ललन पालन हो रहा है। ऐसे मनोदशा में पब्लिक पालिका कभी मूर्त रूप प्राप्त नहीं कर पायेगी। ज्ञान अर्थव्यवस्था में अस्तित्वगत जरूरतों की पूर्ति के लिए भी ज्ञान की जरूरत पड़ेगी। सूचना ही तो आज नई मुद्रा है। पब्लिक पालिका का रास्ता इहलोकतंत्र से होकर गुजरता है। इहलोकतंत्र को स्वराज के पर्यायवाची की तरह भी देखा जा सकता है।

केंद्र ख़तरे में है ॰॰॰

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हर समस्या की जड़ आस्था के केंद्र में निहित है। आस्था तो हर समस्या का समाधान है। तभी तो हर समस्या की जड़ आस्था का केंद्र बन जाता है।

पिछले साल के लोकसभा के चुनाव से लेकर आज तक की ख़बरों पर मैंने अपना शोध किया है। कुछ तथ्यों के आधार पर मैं अपने कथन को स्थापित करने की कोशिश करूँगा। कालक्रम में एक एक कदम पीछे चलते राजनीति की ऐतिहासिक गली में चलिए टहलकर आते हैं। कदम अगर लड़खड़ाये तो सहारे की उम्मीद रखता हूँ। आज ८ फ़रवरी, २०२५ को दिल्ली में भाजपा की सरकार बनी। आज सुबह ही मुझे एक ख्याल आया था कि अगर आज बीजेपी की सरकार दिल्ली में बनी तो केंद्र ख़तरे में आ जाएगा। ऐसा मुझे क्यों लगा इसके पीछे

टूटते घर, बनते मकान!

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पता है! गांव से गुजरते लगता है जैसे पाषाण युग में हम जी रहे हैं। बच्चे पत्थरों से खेल रहे थे। एक दिन नहीं, पिछले एक हफ़्ते से मैं उन्हें पत्थरों से खेलते देख रहा हूँ। हमने तो उनकी हथेलियों से गुल्लियाँ तक छीन लीं। गुल्लियों की गूँज भी इन गलियों में अब कहाँ सुनाई देती है। बस एक चीखता अहंकार लाउडस्पीकर पर सुनाई पड़ता है। घर टूट रहे हैं। मकान बने जा रहे हैं। जैसे किसे ने मुमताज के लिए ताजमहल बनाने की ज़िद्द ठानी हो। बेचारे यहाँ के बच्चे शहरों में धूल फाँककर शेखी बघार रहे हैं। मेरे ससुराल का आँगन जुगनू की बिदाई के बाद सुना हो जाएगा। क्यूंकि यहाँ लौटकर आने वाला अब कोई परिंदा मुझे नजर नहीं आता। मकान भी जर्जर हुआ जा रहा है। किसे चिंता है? सोचो! घर नहीं बनाओगे तो कहाँ लौटकर आओगे?

गाँव बचाओ अभियान

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भारत के गाँव मर रहे हैं, और इसके साथ ही मर रहा है हमारा लोकतंत्र। यह कोई काव्यात्मक अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि एक ठोस वास्तविकता है, जिसे आँकड़ों से सिद्ध किया जा सकता है। 1951 की जनगणना में 82.7% भारतीय गाँवों में रहते थे, आज यह संख्या घटकर 65% के आसपास आ गई है। शहरीकरण को अगर "विकास" का पर्याय मान भी लें, तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह असंतुलित विकास है, एक तरफ़ा प्रवास है, और मूल रूप से एक सामाजिक एवं आर्थिक पतन का लक्षण है।

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