तराज़ू
इक फ़लसफ़ा
सवाल ही तो है….
कितना सरल है ये जताना कि - “मेरे बच्चे! मैं तुमसे प्यार करता हूँ”?
फिर भी ना जाने क्यों हम अपने ही बच्चे को ही सताये चले जा रहे हैं?
कितना आसान है ये समझना कि हमें “सच” का साथ देना चाहिए?
फिर क्यों हम झुठ का साथ निभाये चले जा रहे हैं?
कितना मुश्किल है ये देखना की “बेईमानी और चोरी” से कभी किसी का भला नहीं हुआ?
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