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नशा

Submitted by Sukant Kumar on

वो काम अधूरा रह गया,

जिसे पूरा करने का वक़्त नहीं मिला।

 

वो काम बेहद ज़रूरी होगा,

क्योंकि समय से ज़्यादा, 

उसे साँसों की ज़रूरत थी।

 

वो काम था, जिसमें मन कभी नहीं लगता,

उसका नाम मात्र ही काफ़ी है,

मन-तन-बदन में दर्द उठाने को,

तराज़ू

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बिक जाना तो लाज़मी है,

इस मुकम्मल जहान में,

यहाँ तो संतों और फ़क़ीरों कि,

भी नीलामी होती है,

ख़याल बस इतना रहे,

अपनी क़ीमत को,

अपने जीवन की खुमारी,

और ख़ुशियों की गठरी से,

किसी तराज़ू पर तौल लें,

अपनी क़ीमत को पहचान,

पूर्ण तसल्ली के बाद ही,

इक फ़लसफ़ा

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सबको “भगवान” की तलाश थी,

सब अपने-अपने सफ़र पर निकले।

 

कुछ को मिले,

वे ज्ञान बाँट रहे हैं।

 

कुछ को आभास हुआ,

वे शांति से अपना काम कर रहे हैं।

 

बाक़ी को भ्रम-मात्र है,

वे बस कर्मकांड निभा रहे हैं।

सवाल ही तो है….

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कितना सरल है ये जताना कि - “मेरे बच्चे! मैं तुमसे प्यार करता हूँ”?

फिर भी ना जाने क्यों हम अपने ही बच्चे को ही सताये चले जा रहे हैं? 

 

कितना आसान है ये समझना कि हमें “सच” का साथ देना चाहिए? 

फिर क्यों हम झुठ का साथ निभाये चले जा रहे हैं?

 

कितना मुश्किल है ये देखना की “बेईमानी और चोरी” से कभी किसी का भला नहीं हुआ?

जीवन गणित

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सुना है अक्सर लोगों को कहते,

कभी तो वक़्त बुरा है,

कभी क़िस्मत बुरी है,

कभी दुनिया बुरी है,

तो कभी नसीब खोटा है।

 

क्यों वे लोग नहीं कहते -

बुरा ही सही, ये वक़्त मेरा है,

फूटी ही सही, क़िस्मत ये मेरी है,

छोटी ही सही, ये दुनिया भी मेरी है,

कहानी

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क़िस्से बदल जाते हैं,

कहानियाँ नहीं बदलती।

 

किरदार बदल जाते हैं,

उनकी फ़ितरत नहीं बदलती।

 

हालात बदल जाते हैं,

परिस्थितियाँ नहीं बदलती।

 

हर साल मंजर बदल जाते हैं,

उनकी ख़ुशबू नहीं बदलती।

 

वंशवाद

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फिर देखेंगे हम सब, एक नयी पीढ़ी, इस दुनिया को कैसे, खूबसूरत बनाती है॥

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