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मेरी आर्थिक समस्यायें

जीवन का अर्थ तो आनंद की मात्रा और उसकी गुणवत्ता ही तय करती है। आनंद तो ज्ञान के रास्ते ही मिल सकता है। यह रास्ता किसी के लिए निर्धारित नहीं है, यहीं हम अपने इच्छा-स्वातंत्र्य का प्रयोग करते हैं। यही चुनाव हमारे जीवन के अर्थों का मापदंड है। राम और रावण दोनों ही ज्ञानी थे, उनमें अंतर तो आनंद का ही था। रावण में जो महत्त्वाभिलाषा थी, भोग-विलास की जो लोलुपता थी, उसकी जो शारीरिक हवस थी, जिसके लिए उन्होंने सीता का अपहरण किया था, वह उस ज्ञानी को अभिमानी बना देती है। रावण हमारे अहंकार और घमंड का प्रतीक है। राम अपनी मर्यादा के लिए जाने जाते हैं। उनमें ईमानदारी है, आत्मसम्मान है, स्वाभिमान है। राम और रावण दोनों ही हमारे अंदर हैं, हमें तो बस हर पल चुनाव करना है। यही चुनाव हमारे अस्तित्व को हर क्षण अर्थ देता है। एक पल में जो राम थे, वही अगले क्षण रावण का किरदार निभा सकते हैं।

मेरी मनोवैज्ञानिक समस्यायें

मेरी दो प्रमुख मनोवैज्ञानिक समस्या है। पहला नशा है। मैं कई तरह के नशे का सेवन करता आया हूँ। तंबाकू से शुरू करते हुए मैं शराब तक पहुँच, जहां से ड्रग्स के रास्ता भी कुछ दूर चल चुका हूँ। संभोग एक शारीरिक समस्या तो बाद में है, वह पहले तो यह एक मानसिक उलझन है। नशे से उत्तपन्न भ्रम और संशय ने मेरी चेतना को अज्ञानता के कुचक्र में रहने को मजबूर कर दिया है। हर प्रकार की शारीरिक कमजोरी से लेकर कैंसर तक का सफ़र मैंने अपनी कल्पनाओं में कई बार तय किया है।

मेरी व्यक्तिगत समस्यायें

वनस्पति या पशु जीवन को हमारी ज़रूरत नहीं है, पर हमें हर प्रकार के जीवन की ज़रूरत जान पड़ती है। आख़िर ख़ाना जो आवश्यक त्रय का हिस्सा है, जिसकी पूर्ति तो अन्य जीवन के स्रोतों से ही हमें प्राप्त होती हैं, चाहे हम शाकाहारी हों, या मांसाहारी। अंतर तो सिर्फ़ भावनात्मक स्तर पर होता है, जो Mid-Brain पर आधारित है। आवश्यक त्रय से जुड़ी हर संभावनाओं के लिए हमारा Old-Brain सक्रिय होता है, जिसके अन्तर्गत ख़ाना, संभोग और ख़तरा आता है। इन्हीं तीन पयमानों पर मैं अपनी व्यक्तिगत समस्याओं को समझने की कोशिश करूँगा।

मेरी वर्तमान समस्यायें

भारतीय दर्शन के अनुसार हमारे दुखों के तीन मुख्य स्रोत हैं - आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक! हर इंसान का जीवन सुख और दुख के बीच झूलता रहता है। सुख तो भोगने की चीज है। इसलिए, सुख के कारण पर चिंतन करने की ज़रूरत शायद ही किसी ने ज़रूरी समझी होगी। मैंने भी कभी अपने सुख ओर सवाल नहीं किए हैं। मैं भी अपने दुख को लेकर ही चिंतित रहता हूँ।

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