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बहुत हुआ लोकतंत्र, अब लोगतंत्र की बारी!

Submitted by GyanarthShastri on

जब रविश कुमार ने अपने विशेष संवाद में बंगाल में फैल रही धार्मिक हिंसा को केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित राजनीतिक अस्थिरता बताया, तो उस रिपोर्ट का अंतिम वाक्य — "सत्यानाश आ रहा है, इसे कोई नहीं रोक सकता।" — किसी शास्त्रीय त्रासदी की तरह गूंजता रहा। उसी क्षण, उस मौन में, एक आवाज उठी — "मैं रोकेगा, कोई मेरी बात सुन तो लो।"

पब्लिक पालिका का बजट

Submitted by Sukant Kumar on
सूचना क्रांति आज एक नए मुकाम पर खड़ी है। ज्ञान अर्थव्यवस्था में सूचना ही नई मुद्रा है। कृत्रिम बुद्धि के उपयोग से हम हर विद्यार्थी के लिए एक अनूठा रास्ता तराश सकते हैं। अब स्कूलों में परीक्षाएं नहीं होंगी। ये सारी सामग्री हर विद्यार्थी को जनहित में उपलब्ध रहेगी। स्थानीय स्कूल को इंटरनेट से जोड़कर देश भर की पब्लिक पालिकाएँ यह सुविधा हर छात्र तक पहुंचाएगी। यहाँ हर कल, विज्ञान की विधा पर विशेषज्ञों के व्याख्यान अखीकृत तौर पर उपलब्ध होंगे। छात्र और शिक्षक मिलकर बेहतर सामग्री करने हेतु शोध और सृजन का रास्ता अपनायेंगे। इस उम्मीद के साथ इस बजट में कुछ और जरूरी संशोधन किए गए हैं। अब देश के नागरिक अपनी मांगों को पब्लिक पालिका को दे सकती है, और जहाँ आयकर एक ख़ास सीमा से ऊपर होगा, वहाँ से राज्य पालिका तक अर्थ के रास्ते खुलेंगे। अब नागरिक नहीं, स्थानीय सरकार ही कमाकर राज्य सरकार को पाल रही होगी। राज्य सरकार की जिम्मेदारी उन क्षेत्रों में संसाधनों की आपूर्ति करने की रहेगी जहाँ आय कम हैं। इस तरह अर्थ की आपूर्ति वहाँ भी होगी जहाँ अब तक बिजली नहीं पहुंची। इसी तरह मुद्रण का प्रवाह राज्य से अब केंद्र की ओर होगा, जहाँ से केंद्र उन राज्यों पर विशेष ध्यान देगा जहाँ अभाव का बोध होगा।

गाँव बचाओ अभियान

Submitted by Sukant Kumar on
भारत के गाँव मर रहे हैं, और इसके साथ ही मर रहा है हमारा लोकतंत्र। यह कोई काव्यात्मक अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि एक ठोस वास्तविकता है, जिसे आँकड़ों से सिद्ध किया जा सकता है। 1951 की जनगणना में 82.7% भारतीय गाँवों में रहते थे, आज यह संख्या घटकर 65% के आसपास आ गई है। शहरीकरण को अगर "विकास" का पर्याय मान भी लें, तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह असंतुलित विकास है, एक तरफ़ा प्रवास है, और मूल रूप से एक सामाजिक एवं आर्थिक पतन का लक्षण है।

Four Hypotheses: Public Palika

Submitted by Sukant Kumar on

Good morning. I tried recording the script with satisfactory results. However, I need to improvise before final release. I need to hone up my oration to make the desired impact. The motive behind this creation is to distribute the idea of Public Palika for open discussion particularly within the academics. According to me it is an economic solution to the present crisis India and Indians are facing. I want to make one more episode before I take the Idea to public.

A Dream to Behold...

Submitted by GyanarthShastri on

6 July, 2024

Acknowledging my failures, I gained a reason to succeed. Knowing my reason of failure, I estimated a probable roadmap to success. With a map of treasure in hand, I traveled far & wide, both in physical space and temporal zones. I reached the precise destination dictated by the map. There were no treasure waiting for me, where ever I went. But, at each destination I found guards guarding their ignorance of the absence of treasure. They sucked pleasure from the payment they received in return for their services they offered.

मेरा शोध-प्रस्ताव 

Submitted by Sukant Kumar on
अपने लेखन-परियोजना के दूसरे खंड - "आगे क्या?" पर मैंने काम करना शुरू किया। पर क़रीब 9 अध्याय लिखने के बाद, मुझे अपने लेखन से संतुष्टि नहीं मिली। इसमें सुधार करने की हिम्मत नहीं है। सुधार करने से आसान, मुझे नयी शुरुवात करना ज़्यादा उचित लगा। नौवाँ अध्याय पूरा नहीं हो पाया, अधूरा ही है, शायद ही पूरा हो। पर इसी क़िस्से को एक नये अन्दाज़ में फिर से लिखूँगा।

मैं प्रधानमंत्री बनना चाहता हूँ!

Submitted by Sukant Kumar on
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होते हुए भी हम कितने असहाय हैं, अपने जीवन में सही अभिव्यक्ति को तलाशने में। हम जब कहना चाहते हैं - क्यों नहीं हो पाएगा.. हमारी अभिव्यक्ति में कहीं छिपा होता है - ये नहीं हो पाएगा। हम ख़ुद को जब अभिव्यक्त कर पाने में सक्षम नहीं तो कैसे हम लोकतंत्र को समझ पायेंगे? कैसे वोट कर चुन पायेंगे अपनों को जो हम लोगों के लिये काम कर पाये? Democracy में demoशोध लोगों के लिए था, भारत पहुँचते पहुँचते वो लोकतंत्र हो गया। लोक की सीमा नहीं है, पूरा संसार ही नहीं, उसके परे की भी सलतनत इस परिभाषा में शामिल है - इहलोक भी और परलोक भी। तभी तो मंदिर और मस्जिद के नाम पर वोट करते हैं हम, परलोक के भरोसे। Democracy के लिए हिन्दी में सही शब्द “लोगतंत्र” होना चाहिए था, मेरी समझ से। वैसे लोक ज़्यादा उचित है क्योंकि उसमें इंसान ही नहीं पशु पक्षी भी शामिल किए जा सकते हैं, परियावरण भी। पर ये तभी हो पाएगा जब लोगतंत्र स्थापित हो जाये तब अगला पड़ाव लोकतंत्र का हो सकता है। जब बात विस्तार की आये, तब। जब ज्ञान अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच जाये, तब। और ये तब हो पाएगा जब हम जीवन का अर्थ यानी मतलब और अर्थ यानी मूल्य को समझ पायेंगे।

आगे क्या?

Submitted by Sukant Kumar on
लगभग २० वर्षों के बाद आज भी वही सवाल सामने है - आगे क्या? आज भी वही जवाब है - नहीं पता। आपके पास अगर कोई सुझाव हो तो बतायें। दूसरों की नज़र में तो ख़ुद को असफल देखता ही आया हूँ, आदत सी हो गई है। पर अब तो अपनी नज़रों में भी असफलता का चश्मा पहने घूमता हूँ। माँ पिता की मेहनत और ईमानदारी से कमाई संपत्ति भी बेवजह खर्च करता आया हूँ। आज भी कर रहा हूँ। अब तो मैं ही नहीं मेरे बच्चे की परवरिश की ज़िम्मेदारी उनके माथे पर है। शर्मिंदा हूँ, और असमर्थ भी। लौट कर किसी कंपनी में जूनियर इंजीनियर की तरह काम करने की ना हिम्मत बची है, ना चाहत। हाँ ज़रूरत सी ज़रूर जान पड़ती है। लगभग २० वर्षों के बाद आज भी वही सवाल सामने है - आगे क्या?

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