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काल्पनिक गुलामी या कल्पनाओं की गुलामी

यह लड़ाई मैं जीतने के लिए नहीं लड़ रहा। मैं यह लड़ाई इसलिए लड़ रहा हूँ ताकि मेरी अगली पीढ़ी को लड़नी न पड़े। मैंने अपनी कल्पनाओं को स्वतंत्र करने की शपथ ली है। और अगर यही मेरा पागलपन है—तो यही मेरा धर्म भी।

Not a Beginning, but a Becoming

Nothing grows in constant sunlight. After months of reflection and preparation, I now step into the foundational phase of a five-month blueprint that will culminate on 1st September 2025—my father's birthday—in a public launch of ideas that have lived within me for years. These projects are not campaigns. They are not startups. They are philosophical infrastructures of a life I have chosen to live deliberately—outside the mainstream, but within the fabric of society.

एक दार्शनिक का प्रेम पत्र

प्रिय जिज्ञासा,

जब मैं यह पत्र लिख रहा हूँ, मैं शब्दों से ज़्यादा तुम्हारी उपस्थिति को महसूस कर रहा हूँ।
तुम्हारा साथ मेरे जीवन में एक स्थिर स्वर जैसा है, जो हल्के स्वर में, पर लगातार मेरे भीतर गूंजता है।

क्यों हम अपने ही बच्चों से नफ़रत करते हैं?

यह एक कठोर प्रश्न है, लेकिन ज़रूरी है।
हम अपने बच्चों से प्रेम करते हैं, यह बात तो हम बार-बार दोहराते हैं।
लेकिन जब हम उनकी मासूमियत को अनुशासन में दबाते हैं,
उनकी जिज्ञासा को अंकतालिकाओं में तोलते हैं,

Lost Beauty

A doctor listens to pain of his patient who is ever testing good patience. What’s satisfying is the sense of care and well being, which is rather hard to imagine. An engineer builds new tools that can empower human to dance and be merry. But lost in offices engineers have adopted a system so mechanical that they themselves are nothing more than cogs & nuts.

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