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War Economy vs Lifeconomy

A person thinks about one’s own world. Quid pro quo whole world must think about that one person. Perfection is a temporary illusion, a fleeting state in the long arc of evolution. Every society, every system, no matter how ideal its design, carries within it the seeds of its own contradiction.

Breathe...Until tomorrow...

A third person is nothing but an appearance to me. It depends upon my concept that I conceive a personality out of a person. Personality changes with perception. As such the Advait philosophy stands very clear that brahm is the only reality and every thing else is maya. When asked who is brahm it says - aham that’s me. As such relationship we perceive are apparently our own imagination. An enemy yesteryear can be an ally today.

शिक्षा, स्वराज और पब्लिक पालिका: एक नई सभ्यता की नींव

आज जब हम ग्लोबल विलेज की बात करते हैं, तो यह सोचने का समय है कि राष्ट्र और सीमाओं की परिभाषा पर पुनर्विचार किया जाए। यदि लोकल प्रशासन को सशक्त किया जाए और संसाधनों का नियंत्रण जनता के हाथ में हो, तो क्या यह नस्लीय, धार्मिक और राजनीतिक संघर्षों को कम नहीं करेगा? यदि पब्लिक पालिका मॉडल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लागू किया जाए, तो युद्ध, शरणार्थी संकट और आर्थिक शोषण जैसी समस्याओं को जड़ से समाप्त किया जा सकता है। आखिर, युद्ध वे लड़ते हैं जिन्हें जनता के भविष्य से कोई सरोकार नहीं।

पब्लिक पालिका: व्यक्ति से विश्व तक

पब्लिक पालिका की कल्पना को जीवर्थशास्त्र और इहलोकतंत्र के बिना नहीं समझा जा सकता है। व्यक्ति की जरूरतों और व्यक्तित्व की समृद्धि के लिए जीवर्थशास्त्र में नौ आयामों की चर्चा मिलेगी, जिसे तीन खंडों में समझा जा सकता है — आवश्यक त्रय, अस्तित्वगत त्रय, और शाश्वत त्रय। आवश्यक त्रय में खाना, संभोग और खतरा शामिल है। अस्तित्वगत जरूरतों में शरीर, आत्मा और चेतना की बातें हैं, और शाश्वत त्रय में ईश्वर, सत्य और जीवन को जगह दी गई है। एक लोकहित कल्याणकारी राज्य की जिम्मेदारी बनती है कि उसके निवासियों की बुनियादी जरूरतों की आपूर्ति पर सक्रिय जवाबदेही निभायी जाए।

एक आर्थिक समाधान: पब्लिक पालिका

15 February, 2025

आज सुबह पहली मुलाक़ात रवीश कुमार से हुई। अरसा हो गया जब कोई तार्किक व्यवहारिक प्राणी मुझे व्यक्तिगत जीवन में मिला हो। खैर, रवीश जी रघुवीर सहाय के डायरी के पन्नों को पढ़कर हाल की में हुए दिल्ली चुनाव की व्याख्या करने की कोशिश कर रहे थे। सुनकर बहुत बुरा लगा कि १९६२ में हुए दिल्ली चुनाव में भी हम, भारत के लोगों को राजनीति वैसे ही हाँक रही थी, जैसे आज चरा रही है। थोड़ा आगे बढ़ा तो राहुल गांधीजी से मुलाकात हुई। वे ड्रोन लिए युद्ध की रणनीति समझते मिले। मुझे लगा आज जब ज्ञान विज्ञान इतना आगे बढ़ चुका है, तब भी लोक और तंत्र दोनों युद्ध के लिए इतना आतुर क्यों हैं?

Need I say more?

We are living in a state of personal anarchy. A person is a state in the manner it maintains a sustainable equilibrium with the society one lives in. However, ethical virtues are invariantly applied on a person only in a social environment. Ethics is not at all a personal affair. Before, we delve into the current affairs need I point out that the Eternal Triad is the utmost concern of the Law of the Land. Because, since generations we have been rules under Divine Rule blessed under the Lordship of God. The fall of the medieval ages of Western civilisation is the stark example we must adhere to in the devastating nature of religion hold up by the righteousness of Crusades. No one can count number of dead during the partition of India, and we might be in the midst of Thrid World War. I wonder how many those who lived to see the light of Independence Day, 1947 knew they had just came out of a world war? Even today given the level of education we get I wonder...

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